Sachha Pyaar, Sex Aur Dhokha - rishton main chudai ki Kahani - 6

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//in.tssensor.ru Sachha Pyaar, Sex Aur Dhokha - rishton main chudai ki Kahani - 6

This story is part 6 of 18 in the series

Sachha Pyaar, Sex Aur Dhokha - rishton main chudai ki Kahani - 6
आपी : दादू एक बात तो बताइए. ये पार्टी तो आप ने आपने पोते के आने की खुशी मे दी है ना.
दादू : हन. मैने तुम्हे बताया तो था.
आपी : तो फिर यहाँ "वालेकम रूबो" क्यूँ लिखा हुआ है..?
आपी की बात सुन के रूबी और दादू के चेहरे पे स्माइल आ गयी.
दादू : ये मेरा नही. बल्कि आसिफ़ का काम है. तुम उसी से पूच लो.
रूबी दादू की बात सुन के बेहद खुश हो जाती है. और दिल मे कहती है. मुझे पता था ये उसी का काम है. लेकिन वो है कहाँ..?
आपी : अच्छा तो ये आसिफ़ ने किया है. दादू... वैसे वो है कहाँ..?
दादू : वो बस आता ही होगा. तब तक तुम लोग पार्टी एंजाय करो.
धीरे धीरे मेहमान आने लगते हैं. ज़्यादातर लोग जान पहचान वाले हैं. सब पार्टी का मज़ा लेते हुए एक दूसरे से मिलने मे लगे हुए हैं.
रूबी इस वक़्त सब के साथ होते हुए भी अकेली है. उसके दिल मे बेचैनी है आपने बचपन के दोस्त से मिलने की बेचैनी. उसकी आँखें हर तरफ आसिफ़ को ही ढूँढ रही हैं. रह रह के उसकी नज़रों के सामने आसिफ़ का बचपन का चेहरा आ रहा है. रूबी बचपन की यादों मे खो जाती है.
तभी अचानक म्यूज़िक चेंज होता है और गाना बजने लगता है. जो रूबी के ख़यालों को बिल्कुल मॅच कर रहा है.
"अनदेखा अंजाना सा पागला सा दीवाना सा..
जाने वो कैसा होगा रे...
चोरी से चुपके चुपके बैठा है दिल मे चुपके
जाने वो कैसा होगा रे...
अनदेखा अंजाना सा पागला सा दीवाना सा..
जाने वो कैसा होगा रे...
मेरे ख़यालो मे ना जाने कितनी तस्वीरे बन ने लगी..
बस आसमानो पे दो दिलो की तक़ड़ीरें बन ने लगी..
बिन देखे है ऐसी बेचैनी तौबा ओये रब्बा देखा तो जाने क्या होगा..
सपनो मे आने वाला.
नींदे चुराने वाला.
जाने वो कैसा होगा रे...
पॅल्को के उपर नीचे..
दिल की धड़कन के पीछे.. जाने वो कैसा होगा रे...
अनदेखा अंजाना सा पागला सा दीवाना सा.
जाने वो कैसा होगा रे...
ना जाने क्या होगा क्या ना होगा पहली मुलाक़ात मे..
कैसे चुपाओंगी चाँद को मैं उस चाँदनी रात मे.
चुपके से देखूँगी कुछ ना बोलूँगी.
ओये ओये यह बेचैनी ओये ओये यह बेठाबी..
जाने वो कैसा होगा रे..
जिस को देखा ना बरसो...
उसको देखूँगी कल परसो
जाने वो कैसा होगा रे.."
इधर आसिफ़ का भी यही हाल है वो भी आपनी बचपन की दोस्त से मिलने के लिए तड़प रहा है. वो कभी मुस्कुराते हुए रूबी के दिए हुए उस 100 रुपये के नोट को देखता है तो कभी हवालेी के गाते को.
अजय आसिफ़ को देख के मुस्कुरा के उसे छेड़ते हुए कहता है. है ये क्या हुआ.? मेरा दोस्त तो दीवाना हो गया.
आसिफ़ मूड के अजय की तरफ देखता है और फिर उस नोट को संभाल के आपने पर्स मे रख लेता है. फिर उठ के खड़ा होता है. और किसी को फोन लगता है.
आसिफ़ : अजय तू जा के तैयार हो मैं अभी आता हूँ.
अजय हैरात से उसे देखता है.
अजय : आबे कहाँ चला..?
कहीं तू सच मे रूबी की संडले बनवाने तो नही जा रहा..?
आसिफ़ : नही यार. वो मुझे कुछ ज़रूरी काम है तू अभी जा मैं तुझे आ के सब बताता हूँ.
और फिर आसिफ़ तेज़ी से हवालेी के बाहर चला जाता है.
फ्लॅशबॅक....
आज दो दिन बाद रूबी आपनी खाला के घर से वापिस आ रही है. आसिफ़ हवालेी के गाते पे बैठा बड़ी बेसब्री से उसके आने का इंतेज़ार कर रहा है. उसकी नन्ही आँखें टकटकी लगाए गाते को निहार रही हैं. वो उदास बैठा बड़ी बेसब्री से आपनी दोस्त के आने का इंतेज़ार कर रहा है.
तभी दादू वहाँ आते हैं और बड़े प्यार से आसिफ़ के सिर पे हाथ फेराते हैं.
आसिफ़ पलट के दादू को देखता है और कहता है. दादू वो अभी तक आई क्यूँ नही...?
दादू : बेटा जी वो आ जाएगी क्यूँ परेशन हो रहे हो...?
आसिफ़ : मैं कब से यहाँ बैठा उसका इंतेज़ार कर रहा हूँ. उसने मुझसे वादा किया था की वो आज सुबह ही आ जाएगी. मगर देखो दोपहर हो गयी उसका अभी तक कुछ पता नही. देखा आप ने आज फिर से उसने आपना वादा तोड़ दिया वो हमेशा ही ऐसा कराती है. वो आपना वादा कभी नही निभाती. आज आने दो उसे. मैं उस से नाराज़ हो जवँगा और कभी बात नही करूँगा. मुझे उस पे बेहद गुस्सा आ रहा है.
आसिफ़ की बात सुन के दादू हासने लगे. हाहहाहा..
आसिफ़ : दादू आप हास क्यूँ रहे हैं..? आप बड़े खराब हैं. आप मेरा मज़ाक बना रहे हैं. जाइए मुझे आप से भी बात नही करनी.
दादू : नही बेटा जी मैं आप का मज़ाक नही बना रहा.
आसिफ़ : तो फिर आप हँसे क्यूँ...?
दादू : बेटा जी तुम ने बात ही ऐसी की मुझे हँसी आ गयी. एक बार सूरज का पश्चिम से निकलना मुमकिन हो सकता है मगर तुम जो कह रहे हो वो मुमकिन नही. तुम रूबी से नाराज़ हो जाओ ये इस जानम मे तो मुमकिन नही. चाहे रूबी कितनी भी बड़ी ग़लती क्यूँ ना कर दे तुम उस से कभी नाराज़ नही हो सकते. तुम ने उस से वादा जो किया है. तुम आपने वेड के पक्के हो. मुझे ये भी अच्छे से पता है की तुम उमर भर यहाँ बैठ के रूबी का इंतेज़ार करते रहोगे. सच मे रूबी बड़ी किस्मत वाली है जो उसे तुम जैसे सॅचा दोस्त मिला है.
आसिफ़ : नही दादू किस्मत वाला तो मैं हूँ जो मुझे रूबी की दोस्ती नसीब हुई.
वो एक नेक दिल प्यारी सी पारी है. नही वो तो परियों की रानी है. परियों की रानी से भी क्या कोई नाराज़ हो सकता है.?
फिर जैसे ही आसिफ़ की नज़र सामने से आती हुई कार पे पढ़ती है वो खुशी के मारे उछाल पड़ता है. उसके उदास चेहरे पे प्यारी सी स्माइल आ गयी. खुशी मे उसकी आँखें चमकने लगी. वो खुशी से झूम उठा.
आसिफ़ : दादू वो देखिए रूबी आ गयी.. मेरी दोस्त आ गया.
दादू : हाँ हन देख रहा हूँ. लेकिन तू तो उस से नाराज़ था ना.
आसिफ़ : कैसी बात करते हैं दादू. मैं और आपनी रूबी से नाराज़ ये मुमकिन नही. वो मेरी जान है और कोई आपनी जान से नाराज़ होता है क्या.? मैं आपनी रूबी से ज़रा भी नाराज़ नही हूँ.
कार से उतार के रूबी आसिफ़ के पास आके कहती है.
रूबी : मैं तो तुम से बेहद नाराज़ हूँ. जाओ मुझे नही बात करनी तुमसे.
आसिफ़ : लेकिन क्यूँ.? मेरी ग़लती क्या है.? मैं तो ठीक तुम्हारे कहे के मुताबिक गाते पे बैठ के तुम्हारे आने का इंतेज़ार कर रहा था ताकि मैं तुम्हारा स्वागत कर सकूँ.
रूबी : ऐसे भी क्या कोई किसी का स्वागत कराता है क्या.?
आसिफ़ : तो फिर...?
रूबी : हर तरफ गुलाब के फूल हो. पूरा घर गुलाब के फूलों से सज़ा हो. ज़मीन पे जहाँ भी मेरे पैर पड़े वहाँ कालीन की जगह गुलाब के फूल हो. "वालेकम रूबो" लिखा हुआ हो. तब लगे की स्वागत हुआ है. तुम्हारी तरहा यूँ रूखे सूखे नही.
आसिफ़ : अच्छा तो ऐसे किया जाता है स्वागत. मुझे तो पता ही नही था. आज से मैं सब का स्वागत ऐसे ही करूँगा.
रूबी : जी नही. तुम सिर्फ़ मेरा स्वागत ऐसे करोगे. और किसी का नही. वादा करो मुझसे. चाहे कुछ भी हो तुम हमेशा मेरा स्वागत ऐसे ही करोगे.
आसिफ़ : वादा रहा.
रूबी के चेहरे पे एक प्यारी सी स्माइल आ जाती है.
तो तुम्हे आपना वादा याद था. लेकिन तुमने आपना वादा पूरी तरहा से नही निभाया. तुम ने सारे इंतेज़ां तो कर दिए मगर मेरा स्वागत करने के लिए तुम गाते पे नही आए.
रूबी आपनी यादों मे खोई थी की
तभी अचानक...
रूबी आपने ख़यालों मे खोई हुई थी की तभी अचानक से वहाँ आसिफ़ आ जाता है.
वो रूबी के प्यारे और खूबसूरात चेहरे को बड़े गौर से देखता है और फिर उसे आवाज़ देता है.
आसिफ़ : रूबो...
आपना नाम सुन के रूबी की तंतरा टूटी है.
उसके मूह से निकलता है.
आसिफ़...
रूबी के मूह से आपना नाम सुन के आसिफ़ का दिल खुशी से झूम उठता है.
आसिफ़ मन मे... तो ये मेरे ही बड़े मे सोच रही है. तो क्या हुआ की ये मुझे पहचान नही पाई. ये मुझे पहचानती भी कैसे आज 13 साल बाद हम मिल रहे हैं. हुमारा जिस्म ही नही बल्कि चेहरा भी काफ़ी हद तक बदल चुका है. ये मुझे भूली नही मेरे लिए इतना ही बहुत है. और वैसे भी मेरी रूबो जवान हो के और भी हसीन और खूबसूरात हो गयी है. इसे इस वक़्त अगर जन्नत की पारी देख ले तो वो भी जल उठे.
रूबी आपनी आँखें खोल के देखती है. सामने उसे वोही लड़का (आसिफ़) नज़र आता है जो बाहर उसे मिला था.
रूबी : तुम..?
आसिफ़ : जी ये छोटे मलिक ने आप के लिए भिजवाया है.
रूबी : छोटे मलिक..?
आसिफ़ : जी छोटे मलिक.. मलिक के पोते.. आसिफ़ ख़ान.
रूबी : क्या है ये...?
आसिफ़ : जी वो तो पता नही.
रूबी पॅकेट खोल के देखती है. उसमे एक बेहद खूबसूरात संडले है. संडले देख के रूबी के चेहरे पे एक प्यारी सी स्माइल आ जाती है.
रूबी : वाउ क्या संडले है. इतने खूबसूरात संडले मैने आज तक नही देखे.
तभी वहाँ आपी के साथ आशि और महक भी आ जाते हैं.
आपी : क्या हो रहा है यहाँ...? तुम तो वोही हो ना जो बाहर मिले थे. तुम यहाँ क्या कर रहे हो. कहीं तुम रूबी को परेशन करने तो नही आए. अगर तुम ने रूबी को ज़रा सा भी तंग किया ना तो मैं तुम्हारा वो हाल करूँगी. की तुम याद करोगे.
आसिफ़ : जी मैं तो.. वो तो... ये तो...
आपी : क्या जी मैं तो वो तो..?
रूबी : बस करो आपी आप तो लगता है इस बेचारे के पीछे ही प़ड़ गयी हो.आपी : तू नही जानती रूबी इन सड़कछाप लोगों को. ये ग़रीब लोग नीयत के बहुत खराब होते हैं जहाँ पैसे वाली लड़की देखी नही ये चले आते हैं आपनी लार टपकाते हुए उन्हे आपने झूते प्यार के जाल मे फसाने के लिए ताकि ये उनके मा बाप से अच्छी मोटी रकम वसूल कर सके.
आपी की बात ने आसिफ़ के दिल पे चोट की थी. उसे आपी की बात का बेहद बुरा लगा था. उसे इतना गुस्सा आया की वो आपी को उनकी बात का जावाब देने पे मजबूर हो गया.
आसिफ़ : जी नही आप ग़लत समझ रही हैं मुझे. मैं ऐसा नही हूँ. ग़रीब होना कोई गुनाह नही है. ग़रीबों की भी इज़्ज़त होती है. हर इंसान ग़लत नही होता. ग़रीब लोग लड़कियों और औरातों की इज़्ज़त करना जानते हैं. अमीर और ग़रीब मे फ़र्क सिर्फ़ पैसे का होता है. पैसा तो हाथों का मैल होता है. आज है तो कल नही. इंसान को पैसे का घमंड नही करना चाहिए. मुझे नही पता था की पैसे वाले दिल के इतने ग़रीब होते हैं. मैं यहाँ इनको च्छेदने या आपने प्यार के जाल मे फसाने नही आया था बल्कि इन्हे संडले देने आया था.
ये कह के आसिफ़ गुस्से मे वहाँ से चला जाता है.
रूबी को उसके लिए बहुत बुरा लगता है. जब आपी आसिफ़ को बुरा भला बोल रही तो रूबी से बादश्त नही हो रहा था. उसे ऐसा लग रहा था जैसे आपी उसके किसी ख़ास आपने को बुरा कह रही है. उसे बेहद गुस्सा आ जाता है.
रूबी : मिल गयी शांति आपको. बिना कसूर उस निर्दोष की बेइज़्ज़ती कर के. क्या मिला आप को ऐसा कर के..?
रूबी की बात सुन के आपी आपनी बात पे बेहद शर्मिंदा हो गयी.
आपी : यार तू तो नाराज़ मत हो मुझसे. मैं मानती हूँ की मुझसे ग़लती हो गयी. पर ये ग़लती मुझसे अंजाने मे हुई है. मैने जान के कुछ नही किया. मैने जब उसे यहाँ तुम्हारे पास खड़े देखा तो मुझे लगा की वो तुम्हे अकेली देख के च्छेदने यहाँ आया है. इसलिए मैं यहाँ तुम्हारे पास चली आई. बड़ी बेहन हूँ मैं. मुझे फिकर रहती है तुम्हारी.रूबी : वाह क्या बड़प्पन दिखाया है. किसी को नीचा दिखना बड़प्पन नही होता.
Sachha Pyaar, Sex Aur Dhokha - rishton main chudai ki Kahani - 6
 

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